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कार्मिक संबंधों और उत्तरदायित्वों का ज्योतिषीय अध्ययन : मुसाफ़िर कैफ़े के आलोक में

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  वर्तमान समय का भारतीय समाज एक गहरे संक्रमणकाल से गुजर रहा है। एक ओर अभूतपूर्व तकनीकी विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), वैश्वीकरण और डिजिटल माध्यमों ने मनुष्य के जीवन को पहले से अधिक सुविधाजनक और गतिशील बनाया है, वहीं दूसरी ओर मानसिक तनाव, संबंधों में अस्थिरता, अकेलापन, विवाह के प्रति बदलता दृष्टिकोण, करियर और निजी जीवन के बीच बढ़ता द्वंद्व तथा आत्म-पहचान का संकट भी समान रूप से गहरा हुआ है। आज महानगरों में रहने वाली युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल आर्थिक सफलता अर्जित करना नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं, पारिवारिक उत्तरदायित्वों और भावनात्मक संबंधों के मध्य संतुलन स्थापित करना है, यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सिनेमा और ओटीटी मंचों पर ऐसी कथाओं की संख्या निरंतर बढ़ी है, जिनका केंद्र बाह्य घटनाएँ नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और अस्तित्वगत संघर्ष हैं। नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित वेब सीरीज़ "मुसाफ़िर कैफ़े", जो दिव्य प्रकाश दुबे के चर्चित उपन्यास मुसाफ़िर कैफ़े से प्रेरित है (यद्यपि उसका पूर्ण रूपांतरण न...

एकालाप

रात उतनी ही शांत थी , जितनी किसी साधारण रात को होना चाहिए । बाहर आकाश में तारे थे , पर उनमें कोई विशेष चमक न थी ; सड़क पर कहीं दूर से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आती और फिर सब कुछ वैसे ही स्थिर हो जाता , जैसे समय स्वयं ध्यान में बैठ गया हो । कमरे में दूधिया रोशनी का एक छोटा-सा घेरा था , जिसके भीतर मैं बैठा था मेज़ के सामने , खुली पुस्तक के साथ , पर पुस्तक से बहुत दूर । शब्द सामने थे , अर्थ भीतर से अनुपस्थित । आँखें पंक्तियों पर जातीं , लौट आतीं । एक ही वाक्य कई बार पढ़ा , पर वह मन में प्रवेश न कर सका । तब पुस्तक बंद कर दी ; कभी-कभी ज्ञान बाहर रखा रहता है और पीड़ा भीतर । ऐसे समय पुस्तकें भी द्वार तक आकर लौट जाती हैं । मैं कुर्सी पर पीछे टिक गया । सामने दीवार थी , जिस पर टँगी घड़ी अपनी टिक-टिक से केवल समय नहीं , क्षय का भी बोध करा रही थी। दिन में वही घड़ी सुनाई नहीं देती ; दिन के शोर में समय दब जाता है । रात में उसकी चाल स्पष्ट हो उठती है , जैसे जीवन कह रहा हो जो बीत गया , वह स्वप्न था ; जो आने वाला है , वह भी निश्चित नहीं , केवल यह क्षण है । मन ऐसे समय वर्तमान में टिकना नहीं चाहता ...

ए मित्र.......

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  हम भी चल देंगे किसी दिन उस अगम, अचिन्त्य, अनश्वर पथ पर— तुम भी आओगे; किन्तु बताओ, वफ़ा की शिला चूर कर किस राजसिंहासन पर बैठोगे? मैंने तुम्हें विश्वास का नील गगन दिया था, तुम उसकी सीमा भी न जान सके। अब जब कराल समय तुम्हारे द्वार ध्वंस की धूल उड़ाएगा, तुम अपनी ही छाया से मुख फेरोगे।। ठोकरें आएँगी— अकस्मात्, कठोर, निरंतर; जब पंखों का अभिमान टूटेगा, और पथ भी तुम्हें पहचानने से इन्कार करेगा। तब स्मरण होगा— कर्म का मौन वज्र कैसे गिरता है।। अभी तुम चतुर हो, स्वार्थ की धधकती भट्ठी में तपे हुए; छल तुम्हारी मुद्रा है, हास तुम्हारा आवरण। पर सुनो— विश्वासघात की राख समेटकर तुम फिर कभी हम-सा वफ़ा न गढ़ पाओगे।।

अंत में......

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गिरने, संभलने, चढ़ने  औ फिर चढ़कर गिर जाने के इस निरंतर धैर्य के कुचक्र के अंत में खुद को गिरा ही पाओ  तो जरूरत है उसको स्वीकारने की मांगने, लड़ने, खोने औ बचा खुचा छूट जाने के इस निरंतर दान के रहस्य के अंत में खुद को रिक्त ही पाओ  तो जरूरत है उसको स्वीकारने की फिर  एक दिन तुम गिरोगे अकड़ तो नहीं जाएगी खामोश लेकिन हो जाओगे नकारने, भागने, बदलने औ एक वो "दूसरे मन" के इस निरंतर विद्रोही शक्ति के अंत में अंदर एक द्वंद्व ही पाओ तो जरूरत है उसको स्वीकारने की दबाने, छिपाने, भुलाने  औ मुड़ मुड़ पीछे देखने के इस निरंतर पलायन अभ्यास के अंत में पश्चाताप में ही जाओ तो जरूरत है उसको स्वीकारने की फिर  एक दिन जीत जाओगे  उन थोथे दर्शनों को भी जिसको कभी तुमने वॉट्सएप स्टेटस  अ महफिलों के मेज़ पर परोसा था एक दिन जल की धारा को भी  उस कंक्रीट के बांध की सीमा को  लांघ कर पार जाना ही पड़ता है, जिसके बनने में तुमने  गली से गलियारे तक शोर मचाया था आज जब वक्त विदा लेने का आया है तब तुम्हें मरम्मत का खयाल आया है अपने अंत के इस धुंध में  ज़रूरत है उसे ढूं...

भाषा के तकनीकिकरण में सांस्कृतिक चुनौतियाँ

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यूं तो हर भाषा अपने में वैज्ञानिक होती है बल्कि हिंदी की लघु मात्रा (I) और गुरुमात्रा (S) मानो हिंदी व्याकरण की "बाइनरी" हो और इसी वैज्ञानिकता के कारण भाषा सांस्कृतिक होती है । जिस तरह नदी में खनिज की उपलब्धता होती है उसी प्रकार अपने भाषा मूल धर्म में एक लम्बे समय के ऐतिहासिक यात्रा, भौगोलिक परिवेश, राजनीतिक स्थितियाँ और व्यावहारिक परिवर्तन (व्यापार, मनोवृत्ति आदि के कारण) को अनुस्यूत किए रहता है, इसलिए मानवीय मूल्यों का भी इसमें एक उर्वरक की भूमिका है । इसके इतर जिस तरह मानव के अस्तित्व के लिए संस्कृति निहित सभ्यता की आवश्यकता होती है उसी तरह किसी भी भाषा के विन्यास के दो कारक होते हैं, एक सभ्यता और दूसरी संस्कृति इसलिए भाषा के तकनीकीकरण में उसके संस्कृति का समावेशन आवश्यक है।  सभ्यता परिमित होती है, शब्दों के भौतिक क्षेत्र की प्रगति में सभ्यता का योगदान होता है जबकि संस्कृति शब्दों के गुण धर्म में सांस्कृतिक चेतना काम करती है, संस्कृति अपरिमित होती है। "कुएं की गड़ारी" शब्द भर से कुआं का जल तुरंत स्मृति पर रस्सी के सहारे बाल्टी लटक जाती है, अन्य क्षेत्रों में इसे ...

राम का भाषाई आदर्श लोकमंगल का प्रतिदर्श है

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रामचरित नाम राम के आदर्श चरित्र से आया है, यह आदर्श चरित्र जितना ही निराकार है उतना ही यह सगुण भी है और जितना यह सगुण है उतनी ही इसकी व्यापकता है।  इसलिए उनके आदर्शों की गणना तारों को उंगलियों से गिनने के समान है।  सब कुछ होने के बाद सबसे कठिन होता है उसको मानव कल्याण में प्रसारित करना या दूसरों तक संप्रेषित करना । कोई भी चीज़ व्यापक रुप से तभी संप्रेषित हो सकती है जब वह काल विशेष में एक मधुर माध्यम का आवरण धारण किए रहे।  जिस तरह कांटे और गुलाब मिले रहने के बाद भी कांटो पर ध्यान दिए बिना गुलाब हमें आकर्षित कर लेता है उसी प्रकार किसी भी बात को मधुरता से कह देने से काटे रूपी वैचारिक मलिनता समाप्त हो जाती है और गुलाब की सुगंध रूपी मानवीय चेष्टा दुगुनी हो कर खिलने लगती है। अगर आदर्श राम की आत्मा है तो भाषा तन है, और परम ब्रह्म स्वयं राम हैं, इसीलिए किसी भी अच्छी बात को प्रसारित करने के लिए जितना उचित उस बात का अच्छा होना है उतना ही उचित माध्यम का मधुर होना है।  वाल्मीकि जी के रामायण का माध्यम संस्कृत है जो आगे चल कर अवधी में गोस्वामी जी द्वारा रामचरित मानस हो जाना, समय क...

द्वंद्व

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 यह द्वंद्व सिर्फ उसका नहीं जिसका कुछ भी नहीं, यह द्वंद्व तो उसका भी उतना ही है जिसने कुछ अलग माना ही नहीं, जिसने यह समझ रखा था कि साहित्य में स+हित है,  एक द्वंद्व उसका जिसने एक पहल की थी, द्वंद्व यही था कि दो एक जैसे दिखते मार्ग को समेट कर बताना और सामने वाले का द्वंद्व दूर हो सके की कौन सा मार्ग उचित है। परन्तु बावजूद इसके सामने वाले को द्वंद्व ने घेर रखा था, यह द्वंद दिखावटी प्रतिस्पर्धा का द्वंद था जिसके अलग अलग नाम हो सकते हैं - बाहरी द्वंद/भौतिक द्वंद/ आदि आदि ।  इस बाहरी द्वंद ने उसको एक देखने का नज़र न देकर दो मार्ग दिखलाए। जब किसी अयोग्य सत्ता के नीचे धड़ दबा हो तो उसके विवेक की सक्रियता आप ही निष्क्रिय हो जाती है। इसका प्रभाव बाहरी द्वंद्व पर दिखता है लेकिन इसका असर जो सामने आंतरिक द्वंद्व है उसको अछूता नहीं करता, अंतः द्वंद्व अब स-हित और स्व-हित के  दो धारी तलवार पर नंगे पैर हो गया है, परन्तु अब इसके समाधान की आवश्यकता नहीं।  एक द्वंद है जो आंतरिक है और एक वो जो मुखौटे बदल बदल कर अभिनय कर रहा है इस अभिनय में वो सः के मूल और   स्व के अहम् के...