एकालाप
रात उतनी ही शांत थी , जितनी किसी साधारण रात को होना चाहिए । बाहर आकाश में तारे थे , पर उनमें कोई विशेष चमक न थी ; सड़क पर कहीं दूर से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आती और फिर सब कुछ वैसे ही स्थिर हो जाता , जैसे समय स्वयं ध्यान में बैठ गया हो । कमरे में दूधिया रोशनी का एक छोटा-सा घेरा था , जिसके भीतर मैं बैठा था मेज़ के सामने , खुली पुस्तक के साथ , पर पुस्तक से बहुत दूर । शब्द सामने थे , अर्थ भीतर से अनुपस्थित । आँखें पंक्तियों पर जातीं , लौट आतीं । एक ही वाक्य कई बार पढ़ा , पर वह मन में प्रवेश न कर सका । तब पुस्तक बंद कर दी ; कभी-कभी ज्ञान बाहर रखा रहता है और पीड़ा भीतर । ऐसे समय पुस्तकें भी द्वार तक आकर लौट जाती हैं । मैं कुर्सी पर पीछे टिक गया । सामने दीवार थी , जिस पर टँगी घड़ी अपनी टिक-टिक से केवल समय नहीं , क्षय का भी बोध करा रही थी। दिन में वही घड़ी सुनाई नहीं देती ; दिन के शोर में समय दब जाता है । रात में उसकी चाल स्पष्ट हो उठती है , जैसे जीवन कह रहा हो जो बीत गया , वह स्वप्न था ; जो आने वाला है , वह भी निश्चित नहीं , केवल यह क्षण है । मन ऐसे समय वर्तमान में टिकना नहीं चाहता ...