रक्षाबंधन पत्र
प्रिय बंधुओं एवं सुधिजनों, मनुष्य की प्रवृत्ति मूलतः घुमंतू होती है। वह बहुत समय तक एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सकती। कुछ लोग घूमते-घूमते विभिन्न पर्वत-श्रृंखलाओं और नाना प्रकार की कंदराओं में जा बसते हैं, कुछ की मनोदशा उन्हें जलाशयों एवं तटों के निकट ले जाती है और कुछ तो इतने आगे निकल जाते हैं कि कारागार तक की यात्रा कर आते हैं। यह मानसिक प्रवृत्ति केवल उनके भौतिक भ्रमण तक ही सीमित नहीं रहती, अपितु उनकी जिह्वा एवं हृदय पर भी अपना अयाचित प्रभाव डालती है। जिह्वा के लोलुप प्राणी यह समझ ही नहीं पाते कि उनका यकृत, आँतें, आमाशय, अग्न्याशय, गुर्दे एवं रक्तचाप आदि भीतर से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। किंतु वे इन निरीह अंगों की करुण पुकार को नज़रअंदाज़ करते हुए मनुष्य की इस जिज्ञासु एवं घुमंतू प्रवृत्ति को चिरंजीवी बनाए रखने में लगे हुए हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने तीनों युगों के बाद अब चौथे में भी मात्र मनुष्यता को जीवित रखने का बीड़ा उठा रखा है। इनकी इसी साधना को भावयोग कहा जा सकता है, क्योंकि ये मनुष्य मात्र के भावावेश में आकर मानव जाति की प्राचीन प्रवृत्तियों को जीवंत रखने हेतु अपनी जिह्...