ए मित्र.......

 



हम भी चल देंगे किसी दिन

उस अगम, अचिन्त्य, अनश्वर पथ पर—

तुम भी आओगे;

किन्तु बताओ,

वफ़ा की शिला चूर कर

किस राजसिंहासन पर बैठोगे?


मैंने तुम्हें

विश्वास का नील गगन दिया था,

तुम उसकी सीमा भी न जान सके।

अब जब कराल समय

तुम्हारे द्वार ध्वंस की धूल उड़ाएगा,

तुम अपनी ही छाया से

मुख फेरोगे।।


ठोकरें आएँगी—

अकस्मात्, कठोर, निरंतर;

जब पंखों का अभिमान टूटेगा,

और पथ भी तुम्हें पहचानने से इन्कार करेगा।

तब स्मरण होगा—

कर्म का मौन वज्र

कैसे गिरता है।।


अभी तुम चतुर हो,

स्वार्थ की धधकती भट्ठी में तपे हुए;

छल तुम्हारी मुद्रा है,

हास तुम्हारा आवरण।

पर सुनो—

विश्वासघात की राख समेटकर

तुम फिर कभी

हम-सा वफ़ा न गढ़ पाओगे।।

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुंदर + गहरी भावनाओं के साथ लिखे हैं, अद्भुत लेखनी !!!✍️😍

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