एकालाप
रात उतनी ही शांत थी, जितनी किसी साधारण रात को होना चाहिए । बाहर आकाश में तारे थे, पर उनमें कोई विशेष चमक न थी; सड़क पर कहीं दूर से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आती और फिर सब कुछ वैसे ही स्थिर हो जाता, जैसे समय स्वयं ध्यान में बैठ गया हो । कमरे में दूधिया रोशनी का एक छोटा-सा घेरा था, जिसके भीतर मैं बैठा था मेज़ के सामने, खुली पुस्तक के साथ, पर पुस्तक से बहुत दूर । शब्द सामने थे, अर्थ भीतर से अनुपस्थित । आँखें पंक्तियों पर जातीं, लौट आतीं । एक ही वाक्य कई बार पढ़ा, पर वह मन में प्रवेश न कर सका । तब पुस्तक बंद कर दी; कभी-कभी ज्ञान बाहर रखा रहता है और पीड़ा भीतर । ऐसे समय पुस्तकें भी द्वार तक आकर लौट जाती हैं ।
मैं
कुर्सी पर पीछे टिक गया । सामने दीवार थी, जिस पर टँगी घड़ी अपनी टिक-टिक से केवल समय नहीं, क्षय
का भी बोध करा रही थी। दिन में वही घड़ी सुनाई नहीं देती; दिन
के शोर में समय दब जाता है । रात में उसकी चाल स्पष्ट हो उठती है, जैसे जीवन कह रहा हो जो बीत गया, वह स्वप्न था;
जो आने वाला है, वह भी निश्चित नहीं, केवल यह क्षण है । मन ऐसे समय वर्तमान में टिकना नहीं चाहता । वह पीछे
भागता है उन चेहरों तक, जो कभी अपने थे और अब स्मृति हैं;
उन शब्दों तक, जो कहे जाने चाहिए थे और नहीं
कहे गए; उन अवसरों तक, जहाँ एक निर्णय
दूसरा हो सकता था। फिर वह आगे भागता है उन आशंकाओं की ओर, जिनका
जन्म और मृत्यु रोज होता है ।
मनुष्य
बाहर से एक कमरे में बैठा रहता है, भीतर से न जाने कितने लोकों में भटकता रहता है । मैं उठकर खिड़की तक गया;
बाहर सड़क सुनसान थी । एक आदमी दूर से आता दिखाई दिया । उसके कंधे झुके हुए थे,
जैसे कोई अदृश्य बोझ उठाए हो । वह गुज़रा और अँधेरे में खो गया।
मुझे लगा हम सब ऐसे ही चलते हैं । बाहर से सामान्य, भीतर से
भारग्रस्त, फिर मैंने मोबाईल के कैमेरे में अपना चेहरा देखा । वही चेहरा, जो प्रतिदिन दिखाई देता है; वही आँखें, वही थकान; पर उस रात उसमें कुछ और था एक
रिक्तता, कुछ अलग नहीं था, दिखती है जो
किसी वस्तु की कमी से नहीं, अर्थ की कमी से जन्म लेती है ।
अचानक
अनुभव हुआ कि मैं अकेला हूँ । यह कोई नई बात न थी । मनुष्य प्रायः जानता है कि वह
अकेला है । परिवार, मित्र,
परिचय, संवाद इन सबके रहते हुए भी भीतर एक ऐसा
प्रदेश बचा रहता है, जहाँ कोई दूसरा प्रवेश नहीं करता । उस
रात मैं उसी प्रदेश में पहुँच गया था और तभी भीतर से प्रश्न उठा क्या यह अकेलापन
दंड है, या निमंत्रण? मैं लौटकर बिस्तर
पर बैठ गया । कमरे में सब कुछ व्यवस्थित था किताबें अपनी जगह, मेज़ पर पानी का ग्लास, हवा से पर्दे लहराते हुए ,
खिड़की बंद ; केवल मन ही अव्यवस्थित था और तभी आँखों में जल भर आया , बिना सूचना के , बिना
किसी एक कारण के ।
मैं
चुपके से मौन लेट गया । जैसे संसार को खबर न हो । जैसे दुख को भी पर्दा चाहिए । छत
को ताकने लगा, साँस रोककर, धीरे-धीरे आँसू गिरते रहे ; पर उस रात वही एक बात फिर समझ में आई मैं किसी
व्यक्ति के लिए नहीं रो रहा था, न किसी घटना के लिए । मैं उस
आसक्ति के लिए रो रहा था, जिसे मैं प्रेम समझता रहा । उन
अपेक्षाओं के लिए, जिन्हें मैं अधिकार मानता रहा । उन
कल्पनाओं के लिए, जिन्हें मैं सत्य समझ बैठा था ।
हमारा
अधिकतर दुख वस्तुओं के जाने से नहीं होता, उनसे चिपके रहने से होता है। जिसे हमने “मेरा” कहा, वही
छूटकर हमें रुलाता है । जिसे हमने स्थायी माना, वही बदलकर
हमें तोड़ता है। जिसे हमने सहारा समझा, वही एक दिन चला जाता
है और तब ज्ञात होता है कि सहारा बाहर था ही नहीं ।
आँसू
कुछ देर बाद थम गए , कमरे में वही निस्तब्धता थी । पर भीतर जैसे कोई गाँठ खुलने
लगी थी । मुझे स्मरण आया शास्त्र कहते हैं, संसार दुखमय नहीं, आसक्तिमय है । वस्तुएँ दुख नहीं
देतीं; उनसे बँधना दुख देता है। लोग दुख नहीं देते; उनसे अपनी पहचान जोड़ लेना दुख देता है । समय दुख नहीं देता; उसे रोकना चाहना दुख देता है ।
मैंने
आँखें बंद कर लीं । पहली बार अपने भीतर की बेचैनी को हटाने का प्रयास नहीं किया ।
उसे देखा, जैसे कोई साधक अपने चंचल मन को देखता है । वह उठती थी, गिरती थी, स्मृतियाँ
लाती थी, भय जगाती थी, फिर स्वयं शांत
हो जाती थी; तभी अनुभव हुआ मैं बेचैनी में
नहीं हूँ बल्कि मैं उसे देख रहा हूँ ।
यह
बोध सूक्ष्म था, पर गहरा था जैसे घने
बादलों के बीच कहीं आकाश की एक रेखा दिखाई दे जाए । मन रो रहा था, पर भीतर कहीं एक गवाह था, जो शांत था ; शरीर थका था,
पर भीतर कहीं एक ज्योति थी, जो अप्रभावित थी।
संबंध टूटे होंगे, इच्छाएँ असफल हुई होंगी, योजनाएँ बिखरी होंगी पर जो देख रहा है, वह न टूटा है,
न बिखरा है । शायद आत्मा का प्रथम परिचय ऐसे ही क्षणों में होता है,
जब संसार साथ छोड़ देता है । मैंने धीरे से अपने सिर पर हाथ रखा
जैसे कोई गुरु शिष्य को आशीष देता है और मन ही मन कहा “जो गया, उसे जाने दो, जो नहीं मिला, उसे छोड़ दो जो तुम्हारा
है, वह कभी छूटेगा नहीं”
उस
वाक्य में करुणा भी थी, वैराग्य
भी । वैराग्य संसार से भागना नहीं है बल्कि यह समझ लेना है कि जो बदलने वाला है,
उसमें स्थायित्व मत खोजो । प्रेम करो, पर
पकड़ो मत ; साथ निभाओ, पर स्वत्व मत खोओ ; कर्म करो, पर फल में मत अटक जाओ ।
धीरे-धीरे साँस गहरी हुई । भीतर का कंपन कम हुआ और मैं शिथिल हो गया । अँधेरे में
छत दिखाई नहीं देती थी, पर एक विचित्र शांति थी । सुबह जब
खिड़की खोली, बाहर वही संसार था सड़क, लोग,
धूल, भागती हुई दिनचर्या, उठता हुआ सूरज । दुनिया को मेरी रात का कुछ पता न था ।
दुनिया
को प्रायः पता नहीं होता पर मेरे भीतर कुछ बदल गया था । दुख समाप्त नहीं हुआ था, अकेलापन भी नहीं पर अब मैं उनसे डरता नहीं
था, अब मैं जानता था जब मन बहुत बेचैन होगा, मैं चुपके से
लेट कर छत को ताक लूँगा, फिर बैठकर उसे देखूँगा और धीरे-धीरे,
वह वाला मन भी शांत हो जाएगा क्योंकि अंततः मनुष्य का आश्रय संसार
नहीं, आत्मा है; और सबसे बड़ी संगति
किसी व्यक्ति की नहीं, अपने भीतर के उस मौन की है, जहाँ पहुँचकर सब प्रश्न स्वयं गिर जाते हैं ।
अभी तक में सबसे Best, बहुत बहुत ही ज्यादा अच्छा है ये ।
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